शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

पिछले बीस माह के दौरान बाल संसार के दर्शकों से आशा से कहीं अधिक प्यार मिला है। इसके लिए मैं आप सब की बहुत आभारी हूँ। स्वास्थ्य ठीक रहने के कारण अब मैं बाल संसारको आगे बढ़ा पाने में कठिनाई महसूस कर रही हूँ। अब आपके इस ब्लॉग की जिम्मेदारी श्री अजय विश्वास को सम्भाल रही हूँ। आशा करती हूँ कि वे आपकी आशाओं पर खरे उतरेंगे।
-किरण गुप्ता

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

क्या कहती है घड़ी ?


डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'



टिक-टिक, टिक-टिक, करे घड़ी,

क्या कहती है अरे , घड़ी?

कहती– जो चलते जाते हैं,

वे अपनी मंजिल पाते हैं।

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शनिवार, 8 जनवरी 2011

ठुर-ठुर करती सर्दी आई

बर्फ जो गिरी पहाड़ पर

मैदान हो गए शीत।

ठुर-ठुर करते दादाजी के

दाँत भी गाएँ गीत।


सिर पर चढ़ बैठी है टोपी

बदन को ढ़के स्वीटर।

चाय-पकौड़ी, मुँगफली

संग चलता है हीटर।



सूरज निकला ओढ़ रजाई

गरमी-सा रहा न रूप।

दादी निकली, गई कई घर

पर ढूँढी मिली न धूप।

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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

बाल-संसार के सभी पाठकों को
नव वर्ष की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ!
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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

मकड़ी अपने जाले में क्यों नहीं फंसती?




बच्चो, आपने घर की दीवारों पर जाले लगे तो अवश्य देखे होंगे। ये जाले मकड़ी ही बनाती है, अपने शिकार को फंसाने के लिए। आओ आज मकड़ी के बारे में जानें।

मकड़ी आर्थोपोडा संघ की एक प्राणी है। एक शोध के अनुसार मकड़ी हमारी धरती के प्रचीनतम जीवों में से है। यह लगभग पिछले 4.5 करोड़ वर्षों से इस धरती पर रह रही है। वैज्ञानिकों को मकड़ी का लगभग सवा करोड़ वर्ष पुराना जीवाश्म भी मिला है।

मकड़ी एक प्रकार का कीट है। इसका शरीर शिरोवक्ष और पेट में बँटा होता है। इसके शिरोवक्ष से इसके चार जोड़े पैर लगे होते हैं। इसकी लगभग 40000 प्रजातियाँ बताई जाती हैं। रूस के एक वैज्ञानिक प्रो. अलैग्जैंडर पीटरनेकोफ ने मकड़ियों पर गहन अध्ययन किया। उनके अनुसार मकड़ियों की प्रमुख 92 प्रजातियाँ ही हैं। पीटरनेकोफ ने अपनी प्रयोगशाला में बहुत सी मकड़ियाँ रखी हुई थीं। वे उनकी हर प्रकार की हरकतों पर ध्यान रखते थे।

मकड़ी के पेट में एक थैली होती है, जिससे एक चिपचिपा पदार्थ निकलता है। मकड़ी के पिछले भाग में स्पिनरेट नाम का अंग होता है। स्पिनरेट की सहायता से ही मकड़ी इस चिपचिपे द्रव को अपने पेट से बाहर निकालती है। बाहर निकलकर यह द्रव सूख कर तंतु जैसा बन जाता है। इस से ही मकड़ी अपना जाला बुनती है। मकड़ी के जाले में दो प्रकार के तंतु होते हैं। जिस तंतु से मकड़ी जाले का फ्रेम बनाती है वह सूखा होता है। जाले के बीच के धागे स्पोक्स नाम के चिपचिपे तंतु से बने होते हैं। जाले के चिपचिपे तंतुओं से ही चिपक कर शिकार फंस जाता है। एक बार चिपकने के बाद शिकार छूट नहीं पाता। शिकार के फंसने के बाद मकड़ी सूखे तंतुओं वाले धागों पर चलती हुई शिकार तक पहुँचती है। इसी कारण मकड़ी अपने जाले में नहीं उलझती। वैसे भी मकड़ी के शरीर पर तेल की एक विशेष परत चढ़ी होती है, जो उसे जाले के लेसदार भाग के साथ चिपकने से बचाती है।

प्रो. अलैग्जैंडर पीटरनेकोफ के अनुसार मकड़ी की छह प्रजातियाँ ऐसी भी हैं जो स्वयं के बनाए जाले में उलझ कर रह जाती हैं। वास्तव में वे जाला अपने चारों ओर ही बुन लेती हैं। फिर जाले से बाहर निकलने या उसमें घूमने से असमर्थ रहते हुए मर जाती हैं।

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

सवाल



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


प्यारा-प्यारा चंदा मामा

लिए साथ में आता तारे

पंख लगाकर सूरज आता

रोज सवेरे पास हमारे


तितली को सुन्दर रंगो के

ये कपड़े पहनाए किसने

ठण्डी-ठण्डी हवा चलाई

सुन्दर फूल खिलाए किसने?

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बुधवार, 10 नवंबर 2010

पहेलियाँ-10

1.कान नहीं हैं, नाक नहीं है,

सीने पर कई दांत।

बिन मुख गाऊँ सभी राग मैं,

सदा करूँ रसीली बात।


2.सूरज-सा मेरा नाम है,

उस सा ही रूप बनाऊँ।

उसकी ओर ही करके मुखड़ा,

संग-संग चलता जाऊँ।


3.श्याम वर्ण और तीखे दांत,

लचक-लचक चले नारी।

जिससे मिले उसी को काटे,

तो भी लोग कहें उसे ‘आ री’।


4.रात-रात भर खुशबू देती,

खूब खिलाती फूल।

दिन निकले तो फूलों को,

महकाना जाती भूल।


5.हजारों घूमें बाग-बाग में,

मुँह से लाकर किया इकट्ठा।

उन्हें भगा कोई लूट ले गया,

रस चीनी से भी मीठा।

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उत्तर:1.हारमोनियम 2.सूरजमुखी 3. आरी 4. रजनीगंधा 5. शहद