बदनपुर नाम का एक गाँव था। गाँव में एक सौ के लगभग परिवार रहते थे। अधिकतर लोग खेती-बाड़ी का काम करते थे। लोग बहुत परिश्रमी थे। खेती केवल वर्षा पर निर्भर थी। इसलिए फसल कभी अच्छी हो जाती, कभी ठीक-ठीक।
एक सन्यासी ने गाँववालों से कहा कि अगर वे गाँव में एक मंदिर बनवा लें तो गाँव में खूब बारिश होगी। गाँववालों ने मिल कर एक मंदिर बनवा लिया। गाँव के लोग तो सब भोले-भाले व सीधे थे। किसी को पूजा-पाठ करना नहीं आता था। गाँव में कोई ब्राह्मण परिवार भी नहीं था। शादी-ब्याह के अवसर पर भी आसपास के गाँवों से ही ब्राह्मण आ जाते थे। लोगों ने सोचा, अगर उनके मंदिर में कोई पुजारी आकर रहने लगे तो अच्छा हो। भगवान की पूजा-पाठ का काम ठीक से होता रहेगा। भगवान खुश रहेंगे तो उन पर दया करेंगे।
पास के गाँव में रामचरण नाम का एक पुजारी रहता था। वह बहुत लालची व धूर्त था। इसलिए किसी भी मंदिर में अधिक समय तक नहीं टिक पाता था। उन दिनों कोई काम न होने के कारण वह भूखा मर रहा था। उसे पता चला तो वह अपनी पत्नी के साथ बदनपुर दौड़ा चला आया। उसके पास तन के वस्त्रों के अतिरिक्त मात्र दो मरियल-सी गायें ही थीं।
मंदिर में पुजारी के आ जाने से बदनपुर के लोग बहुत खुश हुए। वे तीनों वक्त पुजारी को खाने के लिए भोजन पहुँचाते। उन्होंने उसे पहनने को अच्छे वस्त्र भी दिए। मंदिर में सुबह-शाम आरती होने लगी। गाँव के लोग आरती में भाग लेने मंदिर जाते।
पुजारी रामचरण को भरपेट भोजन मिलने लगा तो उसके भीतर का लालच व छल-कपट जाग उठा। वह सवेरे व सायं आरती के बाद लोगों से कहता,“आप भगवान के नाम पर अधिक से अधिक दान दें। आप जो देंगे, भगवान आपको उसका सात गुणा देगा।”
भोले-भाले लोग पुजारी की बात पर विश्वास कर थोड़ा बहुत उसे देते रहते। मगर इतने से लालची रामचरण का मन नहीं भरता। वह कभी गाय का दूध बेचने का काम किया करता था। उसने सोचा, अगर वह लोगों को फुसला कर भगवान के नाम पर उनकी गायें ले ले तो उसका दूध का काम चल सकता है।
उसने गाँव के उन लोगों पर नज़र रखनी शुरू कर दी, जिनके पास गायें थीं। सुबह की आरती के बाद वह उनमें से किसी एक को रोक लेता तथा गाय दान करने के लिए उकसाता । वह कहता, “तुम भगवान को एक गाय दोगे तो वह आपको सात गायें देगा।”
लोग उस धूर्त की बातों में आने लगे। एक-एक कर उसने चार गरीब किसानो से उनकी गायें दान में ले लीं। लोगों से गायें लेकर वह बहुत खुश था। अब वह फिर से दूध बेचने लगा।
उस गाँव में सतपाल नाम का एक किसान भी रहता था। उसके पास थोड़ी-सी जमीन थी। खेती से पैदावार भी ठीक-ठीक ही होती थी। घर में पति-पत्नी दोनों ही थे। उनके कोई बच्चा नहीं था। इसलिए गुज़र-बसर ठीक से हो जाती थी। सतपाल के पास एक बढ़िया नस्ल की गाय थी। वह अपनी गाय को बहुत प्यार करता था। वह गाय की सेवा में भी कोई कसर नहीं छोड़ता था। उसे भी पुजारी कई बार गऊदान करने के लिए कह चुका था। परंतु सतपाल का मन नहीं मान रहा था।
एक दिन प्रात: सतपाल अपनी पत्नी के साथ मंदिर गया तो पुजारी ने सब लोगों के सामने कहा, “आज के दिन गऊदान का बहुत महत्व है। जो लोग गऊदान करेंगे, भगवान उन्हें बहुत जल्द एक की सात गायें देगा। भगवान उनके घर बेटा भी देगा।”
घर पहुँच कर सतपाल की पत्नी बोली, “हो सकता है पुजारी जी सच कह रहे हों। क्यों न हम अपनी गाय दान कर दें। घर में सात गायें हो जायेंगी और एक बेटा भी। हमारा मन लगा रहेगा।”
सतपाल ने पत्नी की बात मान ली। वह तुरंत अपनी गाय पुजारी को दे आया। इतनी अच्छी गाय पाकर पुजारी खुशी से पागल हो उठा। उसके मन की इच्छा पूरी हो गई थी।
पुजारी ने अन्य गायों के साथ सतपाल की गाय भी चरने के लिए छोड़ दी। सतपाल की गाय थी बहुत तेज। नित्य की तरह चरने के बाद सायं को उसने सतपाल के घर का रुख कर लिया। उसके पीछे-पीछे पुजारी की शेष छ: गायें भी सतपाल के घर चली गईं।
इतनी जल्दी सात गायें पाकर सतपाल बहुत खुश था। उसने पत्नी से कहा, “पुजारी जी ठीक ही कहते थे। भगवान ने हमें आज ही सात गायें दे दीं।”
जब गायें पुजारी के घर नहीं पहुँची तो उन्हें ढूँढ़ने वह गाँव में निकला। गायें ढूँढ़ता वह सतपाल के घर भी गया। वहाँ अपनी गायें देखकर वह बोला, “ये सब तो मेरी गायें हैं, मेरे घर छोड़कर आओ।”
सतपाल बोला, “पुजारी जी, ये आपकी नहीं, भगवान की गायें हैं। आपने ही तो सुबह कहा था, भगवान आपको सात गायें देगा। सो उसने हमें दे दीं।”
जब सतपाल गायें देने को राजी न हुआ तो पुजारी गाँव के मुखिया के पास गया। मुखिया ने भी कहा, “आज आपने ही तो कहा था कि भगवान एक बदले सात गायें देगा। सो भगवान ने उसके घर भेज दीं।”
पुजारी अपना-सा मुँह लेकर आ गया। लालच में उसकी अपनी दो गायें भी चली गईं।
बच्चो, मनुष्य की बहुत समय से इच्छा रही कि एक ऐसी मशीन बनाई जाए जिसे चलाने के लिए किसी बाहरी शक्ति(मोटर या घोड़े) की ज़रूरत न पड़े। वर्ष 1817 ई. में एक जर्मन व्यक्ति बैरन वान ड्रायस ने छकड़े के दो पहियों को लकड़ी के एक फ्रेम से जोड़कर मुझे जन्म दिया। तब मेरे पैडल नहीं थे। सवार को पाँव जमीन पर रख कर मुझे आगे धकेलना पड़ता था। बहुत बलवान और मजबूत पाँवों वाला व्यक्ति ही मुझे चला पाता था। तब मुझे दो पहियों वाला छकड़ा भी कहते थे। फिर वर्ष 1840 में मेरे अगले पहिये के साथ दो पैडल लगा दिए गए। इससे मुझे चलाना आसान हो गया, परंतु ढ़लान पर मुझे रोकना बहुत कठिन था।
सन् 1845 में एक फ्रांसीसी निकोलस ने मेरे ब्रेक फिट किए तो थोड़ा-सा आराम हो गया। मुझे चलाने पर बहुत जोर लगता था और मैं शोर भी बहुत करता था, इसलिए अमरीकन लोग मुझे ‘बोन-शेकर’ कहते थे। फिर 1865 में मेरे पहियों पर ठोस रबड़ के टायर चढ़ा दिए गए, जैसे छोटे बच्चों के साइकिल पर होते हैं। फिर भी अमरीका के अधिकतर लोग मुझे ‘बोन-शेकर’ ही कहते रहे।
मुझे हल्का बनाने के प्रयास जारी रहे। साल 1870 में मुझ में एक बड़ी तबदीली हुई। छकड़ों के पहियों के स्थान पर धातु के हल्के पहिये लगा दिए गए। ये पहिये धातु की पतली तीलियों से बंधे रहते थे। इस बदलाव ने नई संभावनाओं को जन्म दिया। पैडल वाले अगले पहिये को बड़ा कर दिया गया ताकि थोड़े चक्करों से अधिक दूरी तय की जा सके। मेरे अगले पहिये का आकार 1.5 मीटर तक हो गया। सवार अगले पहिये के ऊपर लगी सीट पर बैठ कर मुझे चलाता था। इससे उसके आगे की ओर गिरने का खतरा बना रहता था।
मैं उन दिनों खड़खड़ भी बहुत करता था। भला हो बाल-बेरिंग की खोज का जिसने 1879 में मुझे इस खड़खड़ से छुटकारा दिलाया। वर्ष 1884 में चेन लग जाने से मेरे दोनों पहियों का आकार समान हो गया और छोटा भी। मेरे पैडलों और पिछले पहिये से गरारियां लग गईं। अब मुझ चलाना आसान व सुरक्षित हो गया।
वर्ष 1890 में एक अंग्रेज जॉन बाइड डनलप ने मेरे हवा भरे टायर लगाए तो मैं बहुत खुश हुआ। फिर 1897 में मुझको अपने-आप घूमने(फ्री-व्हीलिंग) की आज़ादी मिली। अब मैं ‘बोन-शेकर’ नहीं रहा था और उस समय की तेज़ दौड़ने वाली मशीनों में शामिल हो गया था। तब से मुझ में छोटे-मोटे बदलाव होते रहे हैं, लेकिन कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
मोर एक बहुत ही सुन्दर, आकर्षक तथा शान वाला पक्षी है। बरसात के मौसम में काली घटा छाने पर जब यह पक्षीपंख फैला कर नाचता है तो ऐसा लगता मानो इसने हीरों-जड़ी शाही पोशाक पहनी हो। इसलिए इसे पक्षियों काराजा कहा जाता है। पक्षियों का राजा होने के कारण ही सृष्टि के रचयिता ने इसके सिर पर ताज जैसी कलगी लगाईहै। मोर के अद्भुत सौंदर्य के कारण ही भारत सरकार ने 26 जनवरी,1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। हमारेपड़ोसी देश म्यांमार का राष्ट्रीय पक्षी भी मोर ही है। ‘फैसियानिडाई’ परिवार के सदस्य मोर का वैज्ञानिक नाम ‘पावो क्रिस्टेटस’ है। अंग्रेजी भाषा में इसे ‘ब्ल्यू पीफॉउल’ अथवा ‘पीकॉक’ कहते हैं। संस्कृत भाषा में यह मयूर के नाम से जाना जाता है। मोर भारत तथा श्रीलंका में बहुतातमें पाया जाता है। मोर मूलतः वन्य पक्षी है, लेकिन भोजन की तलाश इसे कई बार मानव-आबादी तक ले आती है। मोर प्रारंभ से ही मनुष्य के आकर्षण का केंद्र रहा है। अनेक धार्मिक कथाओं में मोर को बहुत ऊँचा दर्जा दिया गयाहै। हिन्दू धर्म में मोर को मार कर खाना महापाप समझा जाता है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इसपक्षी के महत्व को दर्शाता है। महाकवि कालिदास ने महाकाव्य ‘मेघदूत’ में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी अधिक ऊँचास्थान दिया है। राजा-महाराजाओं को भी मोर बहुत पसंद रहा है। प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य में जो सिक्केचलते थे, उनके एक तरफ मोर बना होता था। मुगल बादशाह शाहजहाँ जिस तख्त पर बैठता था, उसकी शक्ल मोरकी थी। दो मोरों के मध्य बादशाह की गद्दी थी तथा पीछे पंख फैलाए मोर। हीरों-पन्नों से जड़े इस तख्त का नामतख्त-ए-ताऊस’ रखा गया। अरबी भाषा में मोर को ‘ताऊस’ कहते हैं। नर मोर की लंबाई लगभग 215 सेंटीमीटर तथा ऊँचाई लगभग 50 सेंटीमीटर होती है। मादा मोर की लंबाई लगभगसेंटीमीटर ही होती है। नर और मादा मोर की पहचान करना बहुत आसान है। नर के सिर पर बड़ी कलगी तथामादा के सिर पर छोटी कलगी होती है। नर मोर की छोटी-सी पूंछ पर लंबे व सजावटी पंखों का एक गुच्छा होता है।मोर के इन पंखों की संख्या 150 के लगभग होती है। मादा पक्षी के ये सजावटी पंख नहीं होते। वर्षा ऋतु में मोर जबपूरी मस्ती में नाचता है तो उसके कुछ पंख टूट जाते हैं। वैसे भी वर्ष में एक बार अगस्त के महीने में मोर के सभीपंख झड़ जाते हैं। ग्रीष्म-काल के आने से पहले ये पंख फिर से निकल आते हैं। मुख्यतः मोर नीले रंग में पाया जाता है, परंतु यह सफेद, हरे, व जामनी रंग का भी होता है। इसकी उम्र 25 से 30 वर्ष तक होती है। यह बहुत ऊँचा तथा देर तक नहीं उड़ पाता। परंतु इसकी दृष्टि व सूंघने की शक्ति बहुत तेज होतीहै। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह अपने मुख्य दुश्मनों कुत्तों तथा सियारों की पकड़ में कम ही आता है। मादा मोरसाल में दो बार अंडे देती है, जिनकी संख्या 6 से 8 तक रहती है। अंडों में से बच्चे 25 से 30 दिनों में निकल आते हैं।बच्चे तीन-चार साल में बड़े होते हैं। मोर के बच्चे कम संख्या में ही बच पाते हैं। इनमें से अधिकांश को कुत्ते तथासियार खा जाते है। ये जानवर मोर के अंडे भी खा जाते हैं। मोर एक सर्वाहारी पक्षी है। इसकी मुख्य खुराक घास, पत्ते, ज्वार, बाजरा, चने, गेहूं व मकई है। इसके अतिरिक्त यहबैंगन, टमाटर, घीया तथा प्याज जैसी सब्जियाँ भी स्वाद से खाता है। अनार, केला व अमरूद जैसे फल भी यह चावसे खाता है। मोर मुख्य रूप से किसानों का मित्र-पक्षी है। यह खेतों में से कीड़े-मकोड़े, चूहे, छिपकलियां, दीमक वसांपों को खा जाता है। खेतों में खड़ी लाल मिर्च को खाकर यह किसान को थोड़ी हानि भी पहुँचाता है। मोर का ध्यान आते ही कई लोगों के पाँव थिरकने लगते हैं। कहते हैं मनुष्य ने नाचना मोर से ही सीखा है। *****