शुक्रवार, 5 जून 2009

फल चोरी का


श्याम सुन्दर अग्रवाल

जब से चिंकी बंदर ने गरम-गरम जलेबियां बना कर बेचनी शुरू कीं, सुंदरवन में उसकी दुकान खूब चल निकली। चिंकी की बनाई हुई जलेबियां स्वादिष्ट भी बहुत होती हैं। सभी जानवर जलेबियों की तारीफ करते नहीं थकते। चिंकी बंदर है भी बहुत ईमानदार। छोटे से बड़े तक सबको एक जैसा माल देता है, ठीक तौल कर देता है। तभी तो उसकी दुकान पर सुबह से शाम तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है।

सुंदरवन में कालू नाम का एक चूहा भी रहता था कालू को भी जलेबियां बहुत स्वाद लगती थीं। वह जब भी चिंकी की दुकान के सामने से गुजरता तो गरम व रसीली जलेबियां देख उसके मुँह में पानी आ जाता। कालू को अपने माता-पिता से इतने पैसे नहीं मिलते थे कि वह रोज पेट भर जलेबियां खा सके। वैसे भी उसके माता-पिता नहीं चाहते थे कि वह अधिक जलेबियां खाये। अधिक मिठाई खाने से सेहत जो खराब हो जाती है।

एक दिन कालू का दोस्त रमलू चिंकी की दुकान से जलेबियां लेने जा रहा था। कालू भी उसके साथ हो लिया। जब चिंकी रमलू को जलेबियां दे रहा था तो कालू ने चुपके से एक जलेबी खिसका ली। चिंकी को इसका पता नहीं चला। चोरी की वह जलेबी तो कालू को ओर भी स्वाद लगी।

फिर तो कालू का यह रोज का काम ही हो गया। जब भी उसका कोई मित्र चिंकी की दुकान पर जलेबियां खरीदने जाता तो वह भी उसके साथ हो लेता। कालू अपने साथ एक लिफाफा भी ले जाता। जब चिंकी जलेबियां तौलने में लगा होता तो कालू आँख बचा कर दो-तीन जलेबियां अपने लिफाफे में डाल लेता। काम में व्यस्त होने के कारण चिंकी उसे देख नहीं पाता।

कालू के मित्र उसे बहुत समझाते कि चोरी का फल अच्छा नहीं होता। परंतु कालू पर उनकी बात का कुछ असर न होता। वह हँस कर कहता, तुम क्या जानो चोरी की जलेबी का स्वाद! चोरी की जलेबी तो बहुत मीठी होती है। कभी चोरी की जलेबी खा कर तो देखो।

एक दिन सुबह-सुबह ही कालू का मन जलेबी खाने को करने लगा। उसने अपना लिफाफा लिया और कालू की दुकान की तरफ चल पड़ा।

उसके पहुँचने तक चिंकी ने नीम के वृक्ष तले अपनी दुकान सजा ली थी। वह गरम-गरम जलेबियां घी में से निकाल कर चाशनी की कड़ाही में डाल रहा था। कालू एक झाड़ी में छिपा, किसी ग्राहक के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। वह सोच रहा था कि जब चिंकी का ध्यान ग्राहक की ओर होगा तब वह जलेबियां चुरा लेगा। उसने रंगू खरगोश को दुकान की तरफ जाते देखा तो वह भी छिपता-छिपाता दुकान पर पहुँच गया।

रंगू खरगोश ने चिंकी से जलेबियां माँगी तो उसमे गरम चाशनी में डूबी जलेबियां निकाल कर कड़ाही के ऊपर रखी झरनी पर रख दीं। कालू ने देखा कि चिंकी ने अभी तक बड़े थाल में एक भी जलेबी नहीं रखी थी। उसने जान लिया कि आज तो जलेबियां झरनी के ऊपर से ही चुरानी पड़ेंगी। अगले ग्राहक के आने तक तो वह प्रतीक्षा नहीं कर पायेगा।

जैसे ही चिंकी जलेबियां लिफाफे में डाल कर तौलने लगा, कालू जल्दी से कड़ाही पर रखी बड़ी झरनी पर पहुँच गया। जलेबियां बहुत गरम थीं, इसलिए उन्हें खिसकाने में कालू को तकलीफ हो रही थी। तभी चिंकी ने एक और जलेबी लेने के लिए हाथ झरनी की ओर बढ़ाया, तो उसकी निगाह कालू पर पड़ गई। कालू हड़बड़ा गया और अपने लिफाफे समेत गरम चाशनी में जा गिरा।

गरम चाशनी में डुबकियां लगाते कालू को चिंकी ने चिमटे से पकड़ कर बाहर निकाला। फिर उसने कालू को गरम पानी से नहलाया। नहाते समय कालू बुरी तरह से घबराया हुआ था और थरथर काँप रहा था।

चिंकी ने सोचा, अगर कालू को उचित दंड नहीं दिया गया तो उसकी चोरी की आदत नहीं छूटेगी। इसलिए उसने नीम के पेड़ की एक पतली शाखा से कालू की पूंछ बाँध कर उसे धूप में सूखने के लिए लटका दिया।

चिंकी की दुकान पर आने वालों की नज़र ऊपर लटके कालू पर पड़ती। वे हैरान होकर चिंकी से पूछते, नीम के पेड़ पर इतना बड़ा फल कैसा लटक रहा है?

चिंकी कहता, यह नीम का फल नहीं, चोरी का फल है। फिर वह सबको कालू की करतूत के बारे में बताता।

चिंकी की बात सुन सभी जानवर खूब हँसते। कालू तो शर्म के मारे चुपचाप आँखें बंद करके लटका रहा। शाम को जब चिंकी ने कालू को नीचे उतारा तो उसने कान पकड़ कर फिर कभी भी चोरी न करने का वचन दिया।

चिंकी ने उससे कहा, चोरी करने की जगह फालतू समय में मेरे पास आकर काम किया करो। काम के बदले तुम्हें खाने को जलेबियां मिल जाया करेंगी।

चिंकी की बात कालू ने स्वीकार कर ली। कभी-कभी कालू के दोस्त उससे पूछते, चोरी का फल कितना मीठा होता है?

कालू उत्तर देता, चोरी का फल मीठा नहीं, बहुत कड़वा होता है।

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1 टिप्पणी:

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

namaskar mitr,

aapki kahani padhi , sab ki sab behatreen hai .. aapki kahani me baccho ke liye jo bhaav hai ,wo bahut hi gahre hai ..

aapko badhai .. ..

dhanywad.

meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

aapka

Vijay