गुरुवार, 27 अगस्त 2009

कहानी ऐनक की



बच्चों को ऐनक बहुत पसंद है। धूप में रंगीन शीशों वाली ऐनक लगाना तो सभी को बहुत भाता है। आओ आज हम जानें कि हमारी यह प्यारी ऐनक बनी कैसे?
शुरू में ऐनक का प्रयोग कमजोर नज़र वाले लोग नज़र बढाने के लिए ही करते थे। इस काम के लिए लैंस की आवश्यकता होती है। इसलिए यह तो स्पष्ट ही है कि ऐनक का जन्म लैंस के आविष्कार के बाद ही हुआ। सर्वप्रथम नज़र बढाने के लिए लैंस का प्रयोग सन् 1286 ई. में इटली के शहर फ्लोरेंस में हुआ। वहाँ उत्तल लैंस( जो बाहर की ओर उभरे होते हैं) दूर की निगाह का दोष दूर करने के लिए उपयोग में लाए जाते थे। पंद्रहवीं शताब्दी में अवतल लैंस(जो भीतर को दबे होते हैं) भी नज़दीक की निगाह ठीक करने के लिए उपयोग में आ गए थे। लेकिन तब तक ऐनक का फ्रेम अस्तित्व में नहीं आया था। आपको फ्रेम बनाने का काम बहुत आसान लग रहा होगा, मगर ऐसा नहीं था। कोई भी नई खोज करना सरल नहीं होता। यह फ्रेम बहुत कठिनाई से अस्तित्व में आया।
प्रारंभ में लैंसो को व्यक्ति के हैट के घेरे के साथ कस कर बाँध दिया जाता था। जब भी व्यक्ति को कुछ पढ़ना होता या देखना होता तो वह अपना हैट उतारता। फिर लैंसों को आँखों के आगे कर के देखता। बार-बार हैट उतारना और पहनना लोगों को अच्छा नहीं लगता था।
तब किसी ने लैंस को कपड़े की एक छोटी पट्टी में सी कर फैंसी-ड्रैस जैसे एक मुखौटे के रूप में पेश किया। यह हैट में लगे लैंसों से तो ठीक था, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट करने वाला नहीं था। आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति को पट्टी सिर के पीछे कस कर बांधनी पड़ती था। जब ज़रूरत न रहती तो गाँठ खोल कर उसे उतारना पड़ता।
तब एक व्यक्ति को कुछ नया सूझा। उसने लैंसों को धातु के चक्करों में फिट कर दिया। उसने नाक पर टिकाने के लिए एक अर्धगोलाकार कमानी बनाई। उस कमानी के दोनों ओर धातु के तार लगा कर उनके साथ लैंस जोड़ दिए। यह लगभग आज की ऐनक जैसी ही थी, बस इसके साथ कानों पर टिकने वाली डंडियाँ नहीं थीं। इस ऐनक को नाक के ऊपर अच्छी तरह टिकाना पड़ता था। इसे नाक पर टिका कर रखना सर्कस के कलाकार जैसी महारत वाला काम ही था।
अब इस ऐनक को कानों से जोड़ने का काम शेष था। आपको यह काम बहुत आसान लग रहा होगा। लेकिन जैसा पहले कहा, कुछ नया खोजना इतना आसान नहीं होता। अब जो मैं बताने जा रही हूँ, उसे जान कर आपको अवश्य हैरानी होगी। इस ऐनक को कानों पर टिकाने के लिए दो डंडियाँ लगाने में पूरे तीन सौ वर्ष का समय लगा।
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3 टिप्‍पणियां:

रज़िया "राज़" ने कहा…

मज़ेदार जानकारी के लिये आभार।

सुनीता कुमारी ने कहा…

ऐनक पर आप द्वारा दी गई जानकारी रोचक भी है और ज्ञानवर्धक भी। ऐसी जानकारियाँ देते रहियेगा। धन्यवाद।

Kamlesh ने कहा…

बच्चों के लिए आवश्यक एवं ज्ञानवर्धक जानकारी। वास्तव में ही नयी खोज़ करना बहुत कठिन होता है।