(1) वर्षा रानी जल्दी आओ, इस गर्मीसे हमें बचाओ। अपना हुकुम चलाती है, हम सबको झुलसाती है। सूखी-सूखी नदी देखकर, ये दुनिया घबराती है। पानी से डरती है गर्मी, इसकोफ़ौरन सबक सिखाओ। वर्षा रानी जल्दी आओ,
इस गर्मी से हमें बचाओ।
(2)
आओ कोई पौधा लाएँ,
आँगन में हम उसे लगाएँ। कल को ठंडी छाँव मिलेगी, गर्मी से ऐसे टकराएँ। आओ कोई पौधा लाएँ। पेड़ हमारे रक्षक हैं,
हरे-भरे ये शिक्षक हैं। पत्थर खा कर देते फल,
गर्मी का है सुन्दर हल। इस धरती को चलो बचाएँ। आओ कोई पौधा लाएँ,
आँगन में हम उसे लगाएँ।
हमारे स्कूलों में लगभग सभी बच्चे अपनी अंग्रेजी भाषा की शिक्षा ‘ए फार एप्पल’ से ही शुरु करते हैं। वैसे भी हम भारतीयों को आम के बाद जो फल अधिक भाता है, वह सेब ही है। कश्मीर और हिमाचल प्रदेश अपने लाल-रसीले सेबों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। लेकिन बच्चो, आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि सेब भारतीय फल नहीं है। आज से सौ वर्ष पहले भारत में सेब की खेती नहीं होती थी। सेब वास्तव में अमरीकी फल है। इसके भारत में आने की कहानी भी रोचक है। बीसवीं सदी के शुरु की बात है। अमरीका का एक डॉक्टर दंपति भारत के कुष्ठ रोगियों के इलाज के लिए भारत आ रहा था। एक 21 वर्षीय नौजवान सैमुअल इवान स्टोक्स को इस बात का पता लगा। उसने भी इस दंपति के साथ काम करने की ठान ली। फरवरी 1904 में वह डॉक्टर दंपति के साथ भारत आ गया। भारत का गरम मौसम सैमुअल को रास नहीं आया। वह बीमार रहने लगा। इस लिए उसे शिमला भेज दिया गया। शिमला में वह कुष्ठ रोगियों के लिए बने एक घर में काम करने लगा। कुष्ठ रोगियों के साथ-साथ सैमुअल गाँव वालों की मदद भी करता था। वहाँ उसने एक पहाड़ी लड़की से शादी कर ली। उस समय तक भारत में सेब पैदा नहीं होते थे। यहाँ पर सेब जापान और इंगलैंड से मंगवाए जाते थे। 1915 में सैमुअल को अमरीका जाने का अवसर मिला। वहाँ उसे लुसियाना की एक नर्सरी में उगाए जाने वाले रेड डिलिशियस सेबों के बारे में पता चला। सैमुअल इन सेबों की कुछ किस्में अपने साथ भारत ले आया। उसने इन्हें अपने बागों में लगा दिया। अमरीकी सेबों को हिमाचल प्रदेश का मौसम पसंद आ गया। फिर तो और बागों में भी सेब के पेड़ लग गए। लगभग 10 वर्ष बाद भारत में पैदा हुए सेब बाजार में मिलने लगे। लाल मीठे और रसीले सेबों को लोगों ने बहुत पसंद किया। उन दिनों गाँव वाले आलू तथा आलूबुखारे की खेती ही अधिक करते थे। सेब की मांग बढ़ी तो गाँव वालों ने इनकी खेती करनी शुरु कर दी। सैमुअल के भरपूर सहयोग से हिमाचल प्रदेश के बड़े भाग में सेब की खेती होने लगी। सैमुअल ने भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में भी भाग लिया। पता ही नहीं चला वह कब अमरीकी से भारतीय हो गया। इसी तरह सेब के भी अमरीकी से भारतीय फल हो जाने का भी पता नहीं चला। बच्चो, अब जब भी सेब खाओ सैमुअल को अवश्य याद करना।
श्याम सुन्दर अग्रवाल बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था। उस किसान की एक जवान बेटी थी। उसकी नाम था– रूपा। रूपा बहुत ही सुंदर लड़की थी। वह मेहनती भी बहुत थी। वह खेत में अपने पिता के साथ काम करती और घर में माँ के साथ। उसके लिए आराम हराम था। वह सारा दिन किसी न किसी काम में लगी रहती। एक दिन उस देश का राजकुमार उस गाँव से होकर जा रहा था। राजकुमार की नज़र रूपा पर पड़ी। उसने रूपा जैसी सुंदर लड़की पूरे देश में नहीं देखी थी। वह रूपा पर मुग्ध हो गया। रूपा के पीछे-पीछे चलता हुआ वह उसके घर पहुँचगया। राजकुमार ने किसान से कहा, “मैं इस देश का राजकुमार हूँ। मैं आपकी बेटी से विवाह करना चाहता हूँ।” किसान ने पूछा, “क्या तुमने मेरी बेटी रूपा से बात कर ली है?” राजकुमार ने कहा, “नहीं।” “तब अच्छा होगा यदि तुम पहले रूपा से ही पूछ लो।” किसान बोला। राजकुमार रूपा के पास गया और बोला, “मैं इस देश का राजकुमार हूँ। मैं तुम्हारे साथ विवाह करना चाहता हूँ।” रूपा ने पूछा, “क्या तुम कोई काम करना जानते हो?” राजकुमार बहुत हैरान हुआ। उसने कहा, “मुझे काम करने की क्या जरूरत है। मैं राजकुमार हूँ और मेरे पास किसी वस्तु की कोई कमी नहीं है।” रूपा बोली, “मैं तुम्हारे साथ विवाह के बारे में तभी विचार कर सकती हूँ, जब तुम मेरे खेत में स्वयं हल चलाओ जाओ, हल और बैल ले जाओ और खेत में हल चलाओ।” राजकुमार हल और बैल लेकर खेत में चला गया। वह किसान से हल चलाना सीखने लगा। पहले तो उसे हल पकड़ना भी कठिन दिखाई दिया। उसके नर्म हाथों में छाले पड़ गए, परंतु उसने साहस नहीं छोड़ा। कुछ ही दिनों में उसने पूरा खेत जोत दिया। राजकुमार जब रूपा के पास गया तो उसने कहा, “पहले तुम खेत में बीज बोकर आओ, मैं फिर तुम्हारे साथ बात करूँगी।” राजकुमार बीज बोने चला गया। बीज बोने के बाद जब वह रूपा के पास पहुँचा तो वह बोली, “फसल को पानी दो।जानवरों और पक्षियों से इसकी रक्षा करो। तुम फसल के पकने तक प्रतीक्षा करो। जितनी बढ़िया फसल होगी, उतना ही बढ़िया तुम्हें फल मिलेगा।” परिश्रम करता हुआ राजकुमार फसल के पकने की प्रतीक्षा करने लगा। जब फसल पक कर तैयार हो गई तो वह फिर रूपा के पास गया। रूपा ने कहा, “आओ, हम दोनों मिलकर फसल की कटाई करें।” चिलचिलाती धूप में राजकुमार रूपा के साथ मिलकर फसल काटता रहा। धूप में उसका रंग ताँबे-सा हो गया। उसके हाथ बहुत सख्त हो गए। फसल काटने के बाद उन्होंने मिलकर उसे खलिहान तक पहुँचाया। दाने निकल आए तो उन्हें बैलगाड़ी में लादकर रूपा ने राजकुमार से कहा, “जाओ, इन्हें मण्डी में ले जाकर बेच आओ।” राजकुमार फसल के रुपये लेकर जब रूपा के पास पहुँचा तो वह बहुत खुश हुई। उसने राजकुमार से कहा, “मुझे तुम्हारे जैसे मेहनती पति की जरूरत थी। निठल्ले राजकुमार का मैं क्या करती।” दोनों विवाह करने के पश्चात् सुखपूर्वक रहने लगे।
कोयल की आवाज बहुत मीठी होती है। जितनी मीठी उसकी आवाज होती है, उससे कहीं अधिक वह चालाक होती है। अपनी इसी चालाकी से वह कौवों को बेवकूफ बनाती है। अपने अंडों को सेने का काम खुद न कर कौवों से करवाती है।
कौए व कोयल एक ही मौसम में अंडे देते हैं। कौए तथा कोयल के अंडे लगभग एक समान होता हैं। उनमें फर्क करना बहुत कठिन होता है। पता ही नहीं चलता कि कौनसा अंडा कोयल का है और कौनसा कौए का। इसी का फायदा उठा कर कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है। कौए उन अंडों को अपने अंडे समझ कर सेते हैं। होते तो कौए भी बहुत चालाक है, पर कोयल उन्हें धोखा देने में सफल रहती है।
कौए के घोंसले में अपने अंडे रखते समय कोयल बहुत सावधानी बरतती है। जब मादा कोयल ने अंडे रखने होते है, तब नर कोयल कौओं को चिढ़ाता है। कौए चिढ़ कर उसका पीछा करते हैं। पीछा करते कौए अपने घोंसले से दूर चले जाते हैं। तब मादा कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है। कौओं को शक न हो, इसलिए वह अपने जितने अंडे रखती है, कौओं के उतने ही अंडे घोंसले से उठा कर दूर फेंक आती है। फिर वह एक विशेष आवाज निकाल कर नर कोयल को काम पूरा हो जाने की सूचना देती है। तब नर पीछा करते कौओं को चकमा देकर गायब हो जाता है। फिर कौए कोयल के अंडों को अपने अंडे समझकर सेते रहते हैं।
अंडों में से जब बच्चे निकल आते हैं तो कौए उन्हें अपने बच्चे समझकर पालते हैं। बड़े होने पर कोयल के बच्चे, कौओं को चकमा देकर बच निकलने में सफल हो जाते हैं।